जानें प्रदोष व्रत के बारे में!

प्रदोष व्रत करने के लिए उपासक को त्रयोदशी (हिंदू पंचांग की तेरहवीं तिथि को त्रयोदशी कहते हैं) के दिन प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए। नित्‍यकर्मों से निवृत्‍त हाेकर, भगवान श्री भोलेनाथ का स्‍मरण करें। इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है। पूरे दिन उपवास रखने के बाद सूर्यास्‍त से एक घंटा पहले, स्‍नान आदि कर श्‍वेत वस्‍त्र धारण किए जाते हैं। ईशान कोण (घर का उत्तर-पूर्व कोना) की दिशा में किसी ए‍कांत स्‍थल को पूजा करने के लिए प्रयोग करना विशेष शुभ रहता है।

पूजन स्‍थल को गंगाजल या स्‍वच्‍छ जल से शुद्ध करने के बाद गाय के गोबर से लीपकर मंडप तैयार किया जाता है। इस मंडप में पद्म पुष्‍प की आकृति पांच रंगों का उपयोग करते हुए बनाई जाती है। प्रदोष व्रत की आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है।

इस प्रकार पूजन क्रिया की तैयारियां कर उत्‍तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। उपासक को भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए। पूजन में भगवान शिव को जल से अर्ध्‍य देना चाहिए।

प्रदोष का मतलब (Pradosh Name Meaning)

सायंकाल के पश्‍चात् और रात्री आने से पूर्व, दोनों के बीच का संध्‍या समय का जो वक्र होता है उसे ही प्रदोष कहते है।

त्रयोदशी प्रदोष व्रत का महत्त्व ( Pradosh Vrat Ka Mahatva)

त्रयोदशी उर्फ प्रदोष का व्रत करने वाला मनुष्‍य सदा सुखी रहता है। उसके संपूर्ण पापों का नाश इस व्रत से हो जाता है। इस व्रत के करने वे विध्‍वा स्त्रियों को अधर्म से गिलानी होती है। और सुहागन नारियों का सुहाग सदा अटल रहता है। उनकी सभी कामनाआें को कैलाश पति शं‍कर पूरी करते हैं। ज्ञानी कहते हैं त्रयाेदशी का व्रत करने वाले को सौ गऊ दान का फल प्राप्‍त होता हैा इस व्रत को जो विधि‍ विधान से और तन मन धन से करता है उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। सभी माता बहनों को ग्‍यारह त्रयोदशी या पूरी साल की 26 त्रयोदशी पूरी करने के बाद उद्यापन करना चाहिए।

प्रदोष व्रत का समापन या उद्यापन (Pradosh Vrat Ka Udyapan)

इस व्रत को ग्‍यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए। इसे उद्याप करने के नाम से भी जाना जाता है।

प्रदोष व्रत उद्यापन करने की विधि (Pradosh Vrat Udyapan Vidhi)

इस व्रत का उद्यापन करने के लिए त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है। उद्यापन से एक दिन पूर्व श्रीगणेश का पूजन किया जाता हे। पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है। प्रात: उल्‍दी उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्‍त्रों या पद्म पुष्‍पों से सजाकर तैयार किया जाता है। उमा सहित शिवाय नम: मंत्र की एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए हवन किया जाता है। हवन में आहूति के लिए खीर का प्रयोग करते हैं। हवन समाप्‍त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती तथा शांति पाठ किया जाता है। अंत में दो ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है तथा अपने सामर्थ्‍यानुसार दान-दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्‍त करें।

प्रदोष व्रत का परिचय

1:- रवि प्रदोष – आयु आरोग्‍यता के लिये रवि प्रदोष करना चाहिये।
2:- सोम प्रदोष – अभीष्‍ट सिद्ध‍ि की कामना हेतु सोम प्रदोष व्रत करें।
3:- मंगल प्रदोष – रोगों से मुक्‍त और स्‍वास्‍थ्‍य हेतु मंगल प्रदोष व्रत करें।
4:- बुध प्रदोष – सर्व कामना सिद्धि के लिए बुध प्रदोष व्रत करें।
5:- बृहस्‍पति प्रदोष – शत्रु विनाश के लिये बृहस्‍पति प्रदोष करें।
6:- शुक्र प्रदोष – सौभाग्‍य और स्‍त्री की सम़द्धि के लिये शुक्र प्रदोष करें।
7:- शनि प्रदोष – पद प्राप्ति कामना हेतु शनि प्रदोष व्रत करें।

सभी दिनों की प्रदोष व्रत कथा

रविवार प्रदोष व्रत कथा
सोमवार प्रदोष व्रत कथा
मंगलवार प्रदोष व्रत कथा
बुधवार प्रदोष व्रत कथा
बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत कथा
शुक्रवार प्रदोष व्रत कथा
शनिवार प्रदोष व्रत कथा

नोट:- त्रयोदशी के दिन जो वार पड़ता है उसी वार का (त्रयोदशी प्रदोष व्रत) करना चाहिये। तथा उसी दिन की कथा पढ़नी व सुननी चाहिये रवि, सोम, शनि (त्रयोदशी प्रदोष व्रत) अवश्‍य करें। इनसे अभीष्‍ट फल की प्राप्ति होती है।


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