1) सत्संगति है सूप ज्यों, त्यागै फटकि असार । कहैं कबीर गुरु नाम ले, परसै नहीँ विकार ।। अर्थात :- सत्संग सूप के ही तुल्ये है, वह फटक कर असार का त्याग कर देता है। तुम भी गुरु ज्ञान लो, बुराइयों छुओ तक नहीं। 2) मैं मेरा घर जालिया, लिया पलीता हाथ । जो घर
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1) कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय । सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय ।। अर्थात:- कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा। 2) झूठे सुख को सुख कहे, मानत
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1) जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान । मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।। अर्थात:- सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का (उसे ढकने वाले खोल का)। 2) कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई ।
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