उपहार का शाब्दिक अर्थ – उप + हार (जब किसी का आदर करते है या आभार व्यक्त करते है, तो उसे हार पहनाते है। हार पहनाने से कही ऊपर, आभार हम उपहार देके व्यक्त करते है) हर रिश्ते में उपहार का बहुत महत्व होता है, एक दूसरे के लिए प्यार और आदर हम उपहार देके
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आज की समस्याएं और टेंशन इन्सान का टशन ही है। आज व्यक्ति अपने में बदलाव लाने से डरता है, इसका परिणाम की वह हमेशा समस्यायों में ही उलझ रहता है। जब भी कही एक साथ सब बातें करने बैठेंगे सबकी अपनी अपनी समस्याएं सामने आने लगती है, कोई अपने घर से परेशान, कोई ऑफिस से,
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ईमानदारी का वास्तविक अर्थ :- ” ई+ मान+ दारी “ अपने आप के साथ जो वफादार रहे, अपनी आत्मा (I) का मान जो रखता है वह गुण का नाम है ईमानदारी! ईमानदारी को इन्सान का सर्वश्रेष्ठ गुण और गहना कहा जाता है, यह गहना ऐसा है जो आज के समय में हर मनुष्य के अंदर
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आज के समय हर व्यक्ति में अव्यवस्था, मानसिक तनाव और अंतर्मन की शांति का अभाव देखने को मिलता है। कोई भी व्यक्ति थोड़ी सी ज्यादा बात होने पर जुंझला जाता है, उनकी सहन शक्ति और समझने की शक्ति जैसे खत्म सी लगती है। इसका वास्तविक कारण हम सोचे तो पाएंगे की व्यक्ति अपना आत्मविश्लेषण नहीं
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आज के समय में एक प्रॉब्लम हर इन्सान के साथ रहती है, जब वह फ्री होते है और उसके साथ वाले व्यस्त होते है, तो पहेली शिकायत सामने वाले से होती है- “तुम्हारे पास मेरे लिए टाइम ही नहीं है” यह शिकायत एक पति-पत्नी में समय के साथ सबसे ज्यादा, पेरेंट्स की बच्चे के साथ
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आज के समय में हम देखते है की रिश्तों में पहले जितनी मिठास और भावनाये नहीं रही। आखिर इसकी क्या वजह है… अगर थोड़ा सा सोचे तो पाएंगे की रिश्तों में वचन बध्यता का अभाव हो रहा है। आज की पीढ़ी अपने रिश्तों को नहीं समझती और न ही रिश्तों का महत्व। अगर हम सब
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दोस्‍तों अगर आपकों अपनी जिंदगी में सफल बनना है तो, आपको मेहनत, लग्‍न के साथ साथ आपनी आदतों को भी सुधारना पडेगा क्‍योकि हमारी आदतें ही हमारें जीवन को दिशा प्रदान करती है। आपको एक छोटी सी कहानी के जरिये हम यह बताने की कोशिश करते है कि कैसे आदतें हमारी सफलता में मददगार साबित
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बहुत बार हम कुछ ऐसा कर देते हैं या बोल देते हैं जिसके लिए हमें बाद में बहुत खेद और पश्चाताप होता है। खासकर तब जब आपने किसी अपने का दिल दुखाया हो। रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय। आपको हम 5 बातें बताते है
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घनश्याम दास जी बिड़ला (G.D. Birla) द्वारा अपने पुत्र बसंत कुमार जी बिड़ला (B.K. Birla) के नाम 1934 में लिखा गया एक अत्यंत प्रेरक पत्र जो हर एक को जरूर पढ़ना चाहिए। चि. बसंत… यह जो लिखता हूँ उसे बड़े होकर और बूढ़े होकर भी पढ़ना, अपने अनुभव की बात कहता हूँ। संसार में मनुष्य
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एक बार एक अध्यापक कक्षा में पढ़ा रहे थे। अध्यापक ने कागज़ के टुकडे बाँट कर सब बच्चों से कहा कि सब लोग अपने-अपने नाम की एक पर्ची बनायें। सभी बच्चों ने तेजी से अपने-अपने नाम की पर्चियाँ बना लीं और टीचर ने वो सारी पर्चियाँ लेकर एक बड़े से डब्बे में डाल दीं। अब
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