आज के समय में एक प्रॉब्लम हर इन्सान के साथ रहती है, जब वह फ्री होते है और उसके साथ वाले व्यस्त होते है, तो पहेली शिकायत सामने वाले से होती है- “तुम्हारे पास मेरे लिए टाइम ही नहीं है” यह शिकायत एक पति-पत्नी में समय के साथ सबसे ज्यादा, पेरेंट्स की बच्चे के साथ
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आज के समय में हम देखते है की रिश्तों में पहले जितनी मिठास और भावनाये नहीं रही। आखिर इसकी क्या वजह है… अगर थोड़ा सा सोचे तो पाएंगे की रिश्तों में वचन बध्यता का अभाव हो रहा है। आज की पीढ़ी अपने रिश्तों को नहीं समझती और न ही रिश्तों का महत्व। अगर हम सब
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श्रद्धा, विश्वासः, सबूरी कितने सुन्दर तीन शब्दः में पूरी जिंदगी का राज बता दिया – साईबाबा ने… कलयुग में यह तीन शब्दः अगर जीवन में उतर ले तो सब कुछ काफी आसान लगने लगेगा। परिवार संगठित और समाज और राष्ट्र संपन्न … श्रद्धा:- भावार्थ रूप में – हमारी आस्था, आदर, और आंतरिक झुकाव, निस्वार्थ प्रेम।
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1. जहां पहले माँ पिता के चरणों में स्वर्ग होता था। आज वहां माता पिता घर में बोझ लगते है। बच्चों को उनका होना उनकी आजादी में रुकावट लगती है। २. जहां पहले बेटियां पिता के सामने नजरे झुका के बात करती थी। आज नजर उठा के जवाब देना अपनी मोर्डेन सोच बोलती है! ३.
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आज की भागती दौड़ती जिंदगी में अगर किसी से कहे की धैर्य रखना सीखो, लोग इसे बड़े हल्के ले लेते है, उन्हें लगता है जैसे दुनिया इतनी तेज और धीरज रखने की बात करते है। पर यह वाकई अद्भुत सत्य है हम थोड़ा सा धैर्य रख के बड़ी से बड़ी समस्या सुलझा सकते है! जैसे
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दोस्ती कहने में एक शब्दः है.. पर हर इंसान का सबसे करीबी रिश्ता है… दोस्ती सिर्फ शब्दः नहीं जिसका मै अर्थ बता सकू… दोस्ती कोई चीज़ नहीं जिसे मै दिखा सकू… दोस्ती है दिल का रिश्ता, जो हर रिश्ते से ऊपर है… दोस्ती है वफ़ा की परिभाषा जो हर शब्दः से परे है…. दोस्ती मेरी
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प्रकृति हमे देती है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे… सूरज हमे रौशनी देता, हवा नया जीवन देती है… भूख मिटने को हम सबकी, धरती माँ अन्न देती है… पथिको को ताप्ती धुप में, पेड़ सदा देते ह छाया फूल सुगंध देते है, हम सबको फूलों की माला… पहाड़ गिरी ऊँचे ऊँचे, देते
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