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दो लघुकथाएँ “मालिक” और “प्रेम के मायने”

दो लघुकथाएँ “मालिक” और “प्रेम के मायने”

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लघुकथा - मालिक किसान 'ज़मीदार' होता है, ज़मीन का मालिक। लेकिन इसका अहसास कितने लोगों को होता है ?नत्‍थूराम के दोनों बेटे क़ाबिल थे। बड़ा बेटा रोहित एम.ए. करने के पश्‍चात प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था। छोटे बेटे पंकज की इसी वर्ष बी.एस.सी. पूर्ण हो गई थी। नत्‍थूराम एक मेहनती किसान है। अच्‍छी-खासी कृषि योग्‍य भूमि, अपना मकान, पशु सब कुछ था। दोनों पुत्र बाहरी मन से खेती में उसका सहयोग करते। काफी कह-सुन कर नत्‍थूराम दोनों लड़को को अपने साथ खेतों में काम करवाता।'पिताजी, मैं कल सुबह शहर जा रहा हूं। मेरे दोस्‍त के पिता ने फैक्‍ट्री में बात करली है। मल्‍टीनेशनल कंपनी है। दवाइयां बनाजी है। अभी तनख्‍़वाह कम है, पर बता रहे हैं कि फैक्‍ट्री में तनख्‍़वाह बड़ी तेजी से बढ़ती है' पंकज अत्‍यंत उत्‍साहित था।रात्रि को नत्‍थूराम के पूरे परिवार ने भोजन किया। भोजन करने के उपरान्‍त नत्‍थूराम
मदद का जज्‍़बा इसे कहते है ”सीख सुहानी”-

मदद का जज्‍़बा इसे कहते है ”सीख सुहानी”-

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उस दिन की यात्रा के उन दो मिनट की बातचीत ने मेरी जि़ंदगी को नया नज़रिया दे दिया। मदद के मायने मैंने जाने। मैं ऑफिस बस से ही आती जाती हूँ। ये मेरी दिनचर्या का हिस्‍सा है। उस दिन भी बस काफी देर से आई, लगभग आधे-पौने घंटे बाद। खड़े-खड़े पैर दुखने लगे थे। पर चलो शुक्र था कि बस मिल गई। देर से आने के कारण भी और पहले से ही बस काफी भरी हुई थी। बस में चढ़कर मैंने चारों तरु नजर दौड़ाई पाया कि सभी सीटें भर चुकी थी। उम्‍मीद की कोई किरण नजर नहीं आई। तभी एक मजदूरन ने मुझे आवाज लगाकर अपनी सीट देते हुए कहा 'मेडम आप यहां बैठ जाइए'। मैंने उसे धन्‍यवाद देते हुए उस सीट पर बैठकर राहत की सांस ली। वो महिला मेरे साथ बस स्‍टॉप पर खड़ी थी तब मैंने उस पर ध्‍यान नहीं दिया था। कुछ देर बाद मेरे पास वाली सीट खाली हुई, तो मैंने उसे बैठने का इशारा किया। तब उसने एक महिला को उस सीट पर बिठा दिया जिसकी गोद में एक छोटा बच्‍चा
Teacher Student Relationship Short Moral Stories in Hindi

Teacher Student Relationship Short Moral Stories in Hindi

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एक प्राथमिक स्कूल मे अंजलि नाम की एक शिक्षिका थीं वह कक्षा 5 की क्लास टीचर थी उसकी एक आदत थी कि वह कक्षा मे आते ही हमेशा "LOVE YOU ALL" बोला करतीं थी।मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं बोल रही । वह कक्षा के सभी बच्चों से एक जैसा प्यार नहीं करती थीं।कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो उनको फटी आंख भी नहीं भाता था। उसका नाम राजू था। राजू मैली कुचेली स्थिति में स्कूल आ जाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान । पढ़ाई के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता था।मेडम के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखता, मगर उसकी खाली खाली नज़रों से साफ पता लगता रहता कि राजू शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब हे यानी (प्रजेंट बाडी अफसेटं माइड) .धीरे धीरे मेडम को राजू से नफरत सी होने लगी। क्लास में घुसते ही राजू मेडम की आलोचना का निशाना बनन
तीन लघु कथाएं Short Story in Hindi

तीन लघु कथाएं Short Story in Hindi

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तीन लघु कथाएं 1- ईमानदारी - महेश राजा2- प्रवचन - शुभम बैश्‍णव3- पश्‍चाताप की अग्नि - शांतिलाल सोनी  ईमानदारी - महेश राजा थ्री टीयर, स्‍लीपर कोच के पास बड़ी भीड़ थी। जैसे ही टीसी बोगी से बाहर निकला तो लोगों के हजूम ने उसे घेर लिया। लोग 200-500 के नोट लेकर टीसी की तरफ  बढ़े। टीसी ने कहा, 'नही-नही! रहने दीजिए। अंदर जाकर बैठिए। बर्थ होगी तो मैं जरूर आवंटित करूंगा।' उन्‍होंने किसी से भी पैसे नहीं लिए और कुछ लोगों को ईमानदारी से रसीद काट कर सीट आवंटित कर दी।मै रोजाना अप-डाउन करता था। मुझसे रहा नहीं गया तो पूछ लिया, 'क्‍यों साहब, आज ईमानदारी से? क्‍या बात है? मैंने राज जानना चाहा।वे सपाट स्‍वर में बोले, 'आगे विजिलेंस की चेकिंग है'   प्रवचन - शुभम बैश्‍णव गांव के मंदिर में पंडित जी प्रवचन सुना रहे थे। बीच-बीच में वे कहते, 'यह जो सोच है, वही मानव कल्‍
बाड़े की उस कील ने बताया गुस्‍से का प्रभाव!!

बाड़े की उस कील ने बताया गुस्‍से का प्रभाव!!

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बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था। वह बहुत गुस्‍सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आपा खो बैठता और लोगों को भला-बुरा कह देता। उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि अब जब भी तुम्‍हें गुस्‍सा आए तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना। लड़के ने इस बात के लिए हामी भर दी।पहले दिन उस लड़के को 40 बार गुस्‍सा आया और उसने इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी। धीरे-धीरे कीलों की संख्‍या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्‍छा है कि क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी आपा नहीं खोया। उस दिन उसे एक भी कील नहीं गाढ़नी पड़ी।जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्‍होंने उसे एक काम दे दिया। उन्‍होंने कहा कि अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गु
दो प्रेरणादायक कहानियां “याद्दाश्‍त” और “तीसरा मित्र”

दो प्रेरणादायक कहानियां “याद्दाश्‍त” और “तीसरा मित्र”

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याद्दाश्‍त - कमलेश कुमार (Mother Love Short Story in Hindi) बढ़ती उम्र के साथ शांतादेवी की याद्दाशत साथ छोड़ रही थी। चीजें कहीं भी रखकर भूल जातीं, दोबारा दवा खा लेतीं। शाम को पार्क में टहलने जातीं तो वापसी का रास्‍ता भूल जाती और कोई पड़ोसी घर तक छोड़ने आता।कई बार इस वजह से बहू-बेटे को बहुत परेशानी होती थी। शांतादेवी को अहसास था कि उनकी वजह से सब बहुत परेशान हो रहे हैं। एक दिन बेटे के ऑफिस से लौटने के बाद वे उसके पास पहुंची और बोली, 'बेटा, मुझे वृद्धाश्रम छोड़ आ। मेरी भूलने की यह आदत सबे जी का जंजाल बन रही है'।मां की बात पर दुखी बेटा कुह कहता, इससे पहले ही बहू बोल पड़ी, 'मां जी, आपकी याद्दाश्‍त उम्र की वजह से थोड़ी कमजोर हो गई है। हमारी नहीं। परिवार के लिए आपका प्रेम, त्‍याग, समर्पण हम नहीं भूले हैं।आपके बेटे को उनके लिए उठाए गए आपके सारे कष्‍ट याद हैं। मुझ नई-नवेली सहमी बहू को
दो लघु कथाएँ – अन्‍नदाता का अधिकार & वे चार।

दो लघु कथाएँ – अन्‍नदाता का अधिकार & वे चार।

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कथा 1 - अन्‍नदाता का अधिकार मिश्राजी अपने दोस्‍त के यहां आए थे। उनकी बेटी से बोले- 'बेटा अब एमबीबीएस कंप्‍लीट होने के बाद आपको सरकारी अस्‍पताल में जॉइनिंग मिल गई है। पोस्टिंग कहां हुई है?'" ग्राम सुनारी में अंकल।"मेरी बात मानो तो शहर में ही पोस्टिंग करवा लो। पिछले साल मेरे बेटे को अध्‍यापक की पोस्‍टिंग ग्राम जटवाड़ा कला में दे दी गई थी, थोड़ा ले-देकर और राजनितिक पहुंच से हमने उसकी पोस्टिंग शहर में ही करवा दी। वैसे भी आजकल गांवों का तो कोई स्‍टेटस ही नहीं है।'अंकल, गांवों में हमारे देश का अन्‍नदाता रहता है। विपरीत परिस्थितियों से लड़कर हमारेहमारे लिए खाद्यान्‍न उगाता है। हम तक अनाज पहुंचाता है। क्‍या उस किसान और उसके परिवार को शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य जैसी मूलभूत सुविधाएं पाने का अधिकार नहीं है? सिर्फ इसलिए कि वो पिछड़ा हुआ है और हमारे जैसी हाई सोसायटी में नहीं रहता?' वह आगे बोली-
दो कहानी – 1. पालनहार की जीत, 2 कोई अंतर नहीं

दो कहानी – 1. पालनहार की जीत, 2 कोई अंतर नहीं

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कहानी 1. - पालनहार की जीत मां और उसकी दो लड़कियां। दोनों बहनें वयस्‍क। बड़ी बहन ने जब अपने मनपसंद लड़के से शादी की ली तो मां को नागवार लगा। वह लड़का उन्‍हें ठीक नहीं लगा था। तभी से वे बड़ी बेटी से दुखी थीं।छोटी जब समझने लगी तो सोचती 'मैं अतीत की ओर देखती हूं तो हार जाती हूं, क्‍योंकि मां अपनी मंशा से कुछ करने न देंगे।' इतना ही नहीं घर में जब भी छोटी अपनी दीदी का नाम लेती जो मां डांटती हुई कहती, 'खबरदार जो उसका नाम इस घर में लिया तो। यों समझो कि उसके लिए मायके के दरवाजे अब हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं।'बाद में समझ आया कि मां गलत नहीं थी। दीदी ने एक बच्‍ची को जन्‍म दिया था। ससुरालवालों के दबाव के चलते दीदी ने उस दुधमुंही को न अपनाने और त्‍यागने का मन बना लिया था। छोटी को जैसे ही दीदी की मंशा का पता लगा, उसने कहा, 'दीदी अब मैं शादी नहीं करूंगी और उस दुधमुंही को पाल-पोस कर बड़ा करूंगी
यह रिश्ता क्या कहलाता है?

यह रिश्ता क्या कहलाता है?

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यह कहानी नहीं एक सच्चाई है, आज के रिश्तों की..एक व्यक्ति रामकिशन जिसने 14 साल की उम्रः से एक छोटे से किराना के काम से व्यवसाय शुरू किया। पिता की मृत्‍यु चूँकि पहले ही हो चुकी थी, उनके नाना ने उन्हें पाला, उनके 2 भाई और जिनका भार उन पर था। उन्होंने 14 साल की उम्र से अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अपने दोनों छोटे भाइयों को पढ़ा कर एक अच्छी नौकरी के काबिल बना दिया, वह दोनों भाई आज अपने परिवार के साथ सम्‍पन्‍न है।रामकिशन की पत्नी बहुत ममता प्रिय, साक्षात लक्ष्मी महिला, उन्होंने अपने पति का हमेशा साथ दिया दुःख और सुख में, रामकिशन के 6 बेटे और 4 लड़कियां हुई। लगातार 3 बेटियों के बाद उन्हें पुत्र हुआ, उसके बाद लगातार 2 पुत्र और एक पुत्री और २ पुत्र। जैसा की भाई बहिन में उम्र के अनुसार अंतर काफी रहा। पिता ने बहुत संघर्ष किया, अपनी छोटी सी दुकान को नामी (विख्यात) कर दिया पुरे शहर में। आज उनका ब्र
नसीहत – लघुकथा

नसीहत – लघुकथा

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नसीहत मुंबई स्‍टेशन पर खड़ी ट्रेन का इंजतार कर रही थी। मैं प्‍लेटफॉर्म पर बैठी पत्रिका पढ़ने का प्रयास कर रही थी। एक बच्‍चे की गिड़गिड़ाहट ने तन्‍मयता भंग की। सुबू को भूक्‍खा हैं मेम साब! पेट के वास्‍ते कुछ दो ना! आपका बच्‍चा सुखी रहेगा।देखा तो ठीक-ठाक सा चंट बच्‍चा लगा। मैंने वापस नजरें पत्रिका पर जड़ दी। उसकी मांग फिर से हुईा मुंबई में किसी को नजर भर देखने पर भी डर लगता है। ऊपर से मेरा अकेला होना। सो मैंने मन में सोचा भीख देना तो मेरे सिद्धांत के खिलाफ है। मैंने पीछा छुड़ने के लिए नसीहत दे डाली। जो सबके लिए आसान है। 'जाओ मांगते शर्म नहीं आती'फिर अहसास हुआ बच्‍चा वास्‍तव में भूखा है। सोचा पैसे के बदले खाना खरीद कर दिया जा सकता है, अचानक बात याद आ गई कि आजकल आप पर किसी भी तरह से जहर खिलाने का इल्‍जाम लग सकता है। सो मुंह फेर लेने की जुगत सोजने लगी। बच्‍चा शायद मानव मन को पढ़ने में
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