Dohe / Couplets

सूरदास जी, गोस्वामी तुलसीदास जी, रहीम दास जी, कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित हिंदी में | Read Surdas Ji, Tulsidas ji, Rahim Das ji, Kabir Das Ji Famous Dohe ( Couplets ) Arth Sahit in Hindi

सूरदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में – दोहा क्र. 11 से 16 तक

सूरदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में – दोहा क्र. 11 से 16 तक

Dohe / Couplets
सूरदास जी का दोहा क्रमांक : 11) कबहुं बोलत तात खीझत जात माखन खात। अरुन लोचन भौंह टेढ़ी बार बार जंभात॥ कबहुं रुनझुन चलत घुटुरुनि धूरि धूसर गात। कबहुं झुकि कै अलक खैंच नैन जल भरि जात॥ कबहुं तोतर बोल बोलत कबहुं बोलत तात। सूर हरि की निरखि सोभा निमिष तजत न मात॥ अर्थ: यह पद राग रामकली में बद्ध है। एक बार श्रीकृष्ण माखन खाते-खाते रूठ गए और रूठे भी ऐसे कि रोते-रोते नेत्र लाल हो गए। भौंहें वक्र हो गई और बार-बार जंभाई लेने लगे। कभी वह घुटनों के बल चलते थे जिससे उनके पैरों में पड़ी पैंजनिया में से रुनझुन स्वर निकलते थे। घुटनों के बल चलकर ही उन्होंने सारे शरीर को धूल-धूसरित कर लिया। कभी श्रीकृष्ण अपने ही बालों को खींचते और नैनों में आंसू भर लाते। कभी तोतली बोली बोलते तो कभी तात ही बोलते। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण की ऐसी शोभा को देखकर यशोदा उन्हें एक पल भी छोड़ने को न हुई अर्थात् श्रीकृष्ण क
सूरदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में – दोहा क्र. 6 से 10 तक

सूरदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में – दोहा क्र. 6 से 10 तक

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सूरदास जी का दोहा क्रमांक : 6) मिटि गई अंतरबाधा खेलौ जाइ स्याम संग राधा। यह सुनि कुंवरि हरष मन कीन्हों मिटि गई अंतरबाधा॥ जननी निरखि चकित रहि ठाढ़ी दंपति रूप अगाधा॥ देखति भाव दुहुंनि को सोई जो चित करि अवराधा॥ संग खेलत दोउ झगरन लागे सोभा बढ़ी अगाधा॥ मनहुं तडि़त घन इंदु तरनि ह्वै बाल करत रस साधा॥ निरखत बिधि भ्रमि भूलि पर्यौ तब मन मन करत समाधा॥ सूरदास प्रभु और रच्यो बिधि सोच भयो तन दाधा॥ अर्थ: रास रासेश्वरी राधा और रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण एक ही अंश से अवतरित हुये थे। अपनी रास लीलाओं से ब्रज की भूमि को उन्होंने गौरवान्वित किया। वृषभानु व कीर्ति (राधा के माँ-बाप) ने यह निश्चय किया कि राधा श्याम के संग खेलने जा सकती है। इस बात का राधा को पता लगा तब वह अति प्रसन्न हुई और उसके मन में जो बाधा थी वह समाप्त हो गई। (माता-पिता की स्वीकृति मिलने पर अब कोई रोक-टोक रही ही नहीं, इसी का लाभ उठाते हु
सूरदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में – दोहा क्र. 1 से 5 तक

सूरदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में – दोहा क्र. 1 से 5 तक

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सूरदास जी का दोहा क्रमांक : 1) चोरि माखन खात... चोरि माखन खात चली ब्रज घर घरनि यह बात। नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥ कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ। कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥ कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम। हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥ कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि। कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥ सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार। जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥ अर्थ: भगवान् श्रीकृष्ण की बाललीला से संबंधित सूरदास जी का यह पद राग कान्हड़ा पर आधारित है। ब्रज के घर-घर में इस बात की चर्चा हो गई कि नंदपुत्र श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ चोरी करके माखन खाते हैं। एक स्थान पर कुछ ग्वालिनें ऐसी ही चर्चा कर रही थीं। उनमें से कोई ग्वालिन बोली कि अभी कुछ देर पूर्व तो वह मेरे ही घर में आए थे। कोई बोली कि म
गोस्वामी तुलसीदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में

गोस्वामी तुलसीदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में

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गोस्वामी तुलसीदास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस के रचयिता थे और हिंदी साहित्य के महान कवि थे। तुलसीदास जी के दोहे में ज्ञान का सागर है। आप यहां इन दोहों को अर्थ सहित पढ़ सकते हैं, व इनसे मिलने वाली शिक्षा को अपने जीवन में जरूर उतारें। Tulsidas Ji Ke Dohe Arth Sahit With Meaning in Hindi दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान । तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण ।। अर्थ: गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि दया ही धर्म का मूल है और इसके विपरीत अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है।काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान । तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान ।। अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं, जब तक व्यक्ति के मन में काम, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं तब तक एक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति में कोई भेद नहीं रह
रहीम दास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 31 से 41 तक।

रहीम दास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 31 से 41 तक।

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31) रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि । उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि ।। अर्थ: जो व्यक्ति किसी से कुछ मांगने के लिए जाता है वो तो मरे हुए हैं ही परन्तु उससे पहले ही वे लोग मर जाते हैं जिनके मुंह से कुछ भी नहीं निकलता है।32) रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय । हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय ।। अर्थ: कुछ दिन रहने वाली विपदा अच्छी होती है। क्योंकि इसी दौरान यह पता चलता है कि दुनिया में कौन हमारा हित या अनहित सोचता है।33) बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर । पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।। अर्थ: बड़े होने का यह मतलब नहीं है कि उससे किसी का भला हो। जैसे खजूर का पेड़ तो बहुत बड़ा होता है परन्तु उसका फल इतना दूर होता है कि तोड़ना मुश्किल का काम है।34) रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय । सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय ।। अर्थ
रहीम दास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 21 से 30 तक।

रहीम दास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 21 से 30 तक।

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21) बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय । रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय ।। अर्थ: जब बात बिगड़ जाती है तो किसी के लाख कोशिश करने पर भी बनती नहीं है। उसी तरह जैसे कि दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता।22) आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि । ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि ।। अर्थ: ज्यों ही कोई किसी से कुछ मांगता है त्यों ही आबरू, आदर और आंख से प्रेम चला जाता है।23) खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक लगाय । रहिमन करुये मुखन को, चहियत इहै सजाय ।। अर्थ: खीरे को सिर से काटना चाहिए और उस पर नमक लगाना चाहिए। यदि किसी के मुंह से कटु वाणी निकले तो उसे भी यही सजा होनी चाहिए।24) चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह । जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह ।। अर्थ: जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वो राजाओं के राजा हैं। क्योंकि उन्हें ना तो किसी चीज की चाह है, ना ही चिंता और मन तो बिल्कुल
रहीम दास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 11 से 20 तक।

रहीम दास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 11 से 20 तक।

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11) रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय । सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय ।। अर्थ: रहीम कहते हैं की अपने मन के दुःख को मन के भीतर छिपा कर ही रखना चाहिए। दूसरे का दुःख सुनकर लोग इठला भले ही लें, उसे बाँट कर कम करने वाला कोई नहीं होता।12) पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन । अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछे कौन ।। अर्थ: वर्षा ऋतु को देखकर कोयल और रहीम के मन ने मौन साध लिया है। अब तो मेंढक ही बोलने वाले हैं। हमारी तो कोई बात ही नहीं पूछता। अभिप्राय यह है कि कुछ अवसर ऐसे आते हैं जब गुणवान को चुप रह जाना पड़ता है. उनका कोई आदर नहीं करता और गुणहीन वाचाल व्यक्तियों का ही बोलबाला हो जाता है।13) रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय । हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय ।। अर्थ: रहीम कहते हैं कि यदि विपत्ति कुछ समय की हो तो वह भी ठीक ही है, क्योंकि विपत्ति में ही सबके विषय म
रहीम दास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 1 से 10 तक।

रहीम दास जी के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 1 से 10 तक।

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1) बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय । रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय ।। अर्थ: मनुष्य को सोचसमझ कर व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि किसी कारणवश यदि बात बिगड़ जाती है तो फिर उसे बनाना कठिन होता है, जैसे यदि एकबार दूध फट गया तो लाख कोशिश करने पर भी उसे मथ कर मक्खन नहीं निकाला जा सकेगा।2) रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय । टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय ।। अर्थ: रहीम कहते हैं कि प्रेम का नाता नाज़ुक होता है। इसे झटका देकर तोड़ना उचित नहीं होता। यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूट जाता है तो फिर इसे मिलाना कठिन होता है और यदि मिल भी जाए तो टूटे हुए धागों के बीच में गाँठ पड़ जाती है।3) रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि । जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि ।। अर्थ: रहीम कहते हैं कि बड़ी वस्तु को देख कर छोटी वस्तु को फेंक नहीं देना चाहिए। जहां छोटी सी सुई काम आती
कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 71 से 95 तक।

कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 71 से 95 तक।

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71) मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार। जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।। अर्थ: दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं, पर जब वह नहीं मिलता तब वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।72) माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥ अर्थ: मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तो तू मुझे पैरों के नीचे रोंद रहा है, लेकिन एक दिन ऐसा आएगा, कि तू मेरे तले होगा| अर्थात, जीवन में मनुष्य चाहे जितना भी शक्तिशाली हो, मृत्यु के बाद उसका शरीर मिट्टी हो जाता है|73) माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माहि । मनुआ तो चहुं दिश फिरे, यह तो सुमिरन नाहि ॥ अर्थ: माला घुमाने से, या मंत्रो का उच्चारण करने से ध्यान नहीं होता। अर्थात ध्यान होता है मन को स्थिर करने से, क्रियाएं करने से नहीं।74) मन उन्मना न तोलिये, शब
कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 51 से 70 तक।

कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 51 से 70 तक।

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51) हरि रस पीया जानिये, कबहू न जाए खुमार । मैमता घूमत फिरे, नाही तन की सार ॥ अर्थ: जिस व्यक्ति ने परमात्मा के अमृत को चख लिया हो, वह सारा समय उसी नशे में मस्त रहता है। उसे न अपने शरीर कि, न ही रूप और भेष कि चिंता रहती है।52) जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश । मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास ॥ अर्थ: शुद्ध हृदय के साथ भगवान् को याद करने से सारे पाप ऐसे नष्ट हो जाते हैं, जैसे कि सूखी घास पर आग की चिंगारी पड़ी हो।53) जग में बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होय | यह आपा तो डाल दे , दया करे सब कोए || अर्थ: आपके मन में यदि शीतलता है, अर्थात दया और सहानुभूति है, तो संसार में आपकी किसी से शत्रुता नहीं हो सकती। इसलिए अपने अहंकार को निकाल बाहर करें, और आप अपने प्रति दूसरों में भी समवेदना पाएंगे।54) जहाँ दया तहाँ धर्म है,जहाँ लोभ तहाँ पाप । जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥
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