कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 51 से 70 तक।

51) हरि रस पीया जानिये, कबहू न जाए खुमार ।
मैमता घूमत फिरे, नाही तन की सार ॥
अर्थ: जिस व्यक्ति ने परमात्मा के अमृत को चख लिया हो, वह सारा समय उसी नशे में मस्त रहता है। उसे न अपने शरीर कि, न ही रूप और भेष कि चिंता रहती है।

52) जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश ।
मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास ॥
अर्थ: शुद्ध हृदय के साथ भगवान् को याद करने से सारे पाप ऐसे नष्ट हो जाते हैं, जैसे कि सूखी घास पर आग की चिंगारी पड़ी हो।



53) जग में बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होय |
यह आपा तो डाल दे , दया करे सब कोए ||
अर्थ: आपके मन में यदि शीतलता है, अर्थात दया और सहानुभूति है, तो संसार में आपकी किसी से शत्रुता नहीं हो सकती। इसलिए अपने अहंकार को निकाल बाहर करें, और आप अपने प्रति दूसरों में भी समवेदना पाएंगे।

54) जहाँ दया तहाँ धर्म है,जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥
अर्थ: जहाँ दया-भाव है, वहाँ धर्म-व्यवहार होता है। जहाँ लालच और क्रोध है वहाँ पाप बसता है। जहाँ क्षमा और सहानुभूति होती है, वहाँ भगवान् रहते हैं।

55) जहाँ न जाको गुन लहै, तहाँ न ताको ठाँव ।
धोबी बसके क्या करे, दीगम्बर के गाँव ॥
अर्थ: जहाँ पर आपकी योग्यता और गुणों का प्रयोग नहीं होता, वहाँ आपका रहना बेकार है। उदाहरण के लिए, ऐसी जगह धोबी का क्या काम, जहाँ पर लोगों के पास पहनने को कपड़े नहीं हैं।

56) जैसा भोजन खाइये , तैसा ही मन होय ।
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय ॥
अर्थ: शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं। अर्थात, जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।

57) ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग ।
तेरा साईं तुझमे है, तू जाग सके तो जाग ॥
अर्थ: जिस तरह तिल में तेल होता है, और पत्थरों से आग उत्पन्न हो सकती है, उसी प्रकार भगवान् भी आपके अंतर्गत हैं। उन्हें जगाने की शक्ति पैदा करने की आवश्यकता है।

58) कबीर क्षुधा कूकरी, करत भजन में भंग ।
वाकूं टुकडा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग ॥
अर्थ: संत कबीरदास कहते हैं कि भूख ऐसी कुतिया के समान होती है, जो कि भजन साधना में बाधा डालती है। इसे शांत करने के लिए अगर समय पर रोटी का टुकडा दे दिया जाए तो फिर संतोष और शांति के साथ ईश्वर का स्मरण हो सकता है।

59) कबीरा गर्व ना कीजिये, ऊंचा देख आवास ।
काल पड़ो भू लेटना, ऊपर जमसी घास ॥
अर्थ: अपना शक्ति और संपत्ति देख कर घमंडी मत बनिए। जब इस शरीर से आत्मा निकल जाती हैं तो सबसे शक्तिशाली मनुष्य का देह भी धरती में दाल दिया जाता है, और उसके ऊपर घास उग जाती है।

60) कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जाएँगे, पड़ा रहेगा म्यान ॥
अर्थ: अपना सारा समय सोते हुए मत बिताइए। भगवान् को याद कीजिये, क्योंकि यमराज के आने पर (अर्थात मृत्यु के समय ), बिन आत्मा का यह शरीर उस तरह होगा, जैसे बिना तलवार के म्यान।

61) कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥
अर्थ: जो लोग गुरु और भगवान् को अलग समझते हैं, वे सच नहीं पहचानते। अगर भगवान् अप्रसन्न हो जाएँ, तो आप गुरु की शरण में जा सकते हैं। लेकिन अगर गुरु क्रोधित हो जाएँ, तो भगवान् भी आपको नहीं बचा सकते।

62) कबीरा तेरी झोपडी, गल कटीयन के पास ।
जैसी करनी वैसे भरनी, तू क्यों भया उदास ॥
अर्थ: कबीर ! तेरा घर कसाई के पास है तो क्या ? उसकी हरकतों के लिए तू ज़िम्मेदार नहीं है। अर्थात, अपने कर्मों का फल सबको खुद ही भुगतना पड़ता है।

63) कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा |
कई सेवा कर साधू की, कई गोविन्द गुण गा ||
अर्थ: हर व्यक्ति कि मृत्यु तो निश्चित है। इसीलिए अपना जीवन काल उचित एवं लाभकारी कामों में लगाना चाहिए, जैसे कि साधुओं की सेवा और भगवान् कि भक्ति।

64) कहे कबीर कैसे निबाहे, केर बेर को संग ।
वह झूमत रस आपनी, उसके फाटत अंग ॥
अर्थ: कबीर कहते हैं कि विभिन्न प्रकृति के लोग एक साथ नहीं रह सकते। उदाहरण के लिए, केले और बेर का पेड़ साथ नहीं उग सकते, क्योंकि जब हवा से बेर का पेड़ हिलेगा तो उसके काँटों से केले के पत्ते नष्ट हो जायेंगे।

65) करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिन रात ।
कूकर सम भूकत फिरे, सुनी सुनाई बात ॥
अर्थ: अज्ञानी व्यक्ति काम कम और बातें अधिक करते हैं। ऐसे लोग खुद अपना तर्क रखने के बजाय सुनी सुनाई बातों को ही रटते रहते हैं।

66) केसों कहा बिगडिया, जे मुंडे सौ बार ।
मन को काहे न मूंडिये, जा में विशे विकार ॥
अर्थ: जो लोग धार्मिक कारणों से बार-बार मुंडन करते हैं, कबीर उनसे पूछतें हैं, कि बालों को किस बात की सज़ा दे रहे हो, जो उन्हें निरंतर मुंडाते रहते हो? इसकी जगह, अपने मन को साफ़ करो, जिसमे बुराईयाँ भरी हुई हैं। अर्थात, अपने विचारों पर ध्यान दो, केवल अनुष्ठानों और क्रियायों पर नहीं।

67) खाय पकाय लूटाय ले, करि ले अपना काम ।
चलती बिरिया रे नरा, संग न चले छदाम ॥
अर्थ: मनुष्य को इस जीवन में अपनी शक्ति और साधन का भरपूर प्रयोग करना चाहिए – अपने कामों के लिए, दूसरों कि सहायता के लिए और परोपकार के कार्यों में। इस तरह उसे अपना जीवन सार्थक करना चाहिए, क्योंकि संसार से जाते समय एक भी वस्तु उसके साथ नहीं जायेगी।

68) कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि ।
बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि ॥
अर्थ: जो हर पहर जागता रहता है, उसके कपड़े और बर्तन कोई नहीं ले जा सकता। अर्थात, हमेशा सचेत और सावधान रहना चाहिए।

69) कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे हॉट न हार |
साधू बचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ||
अर्थ: कटु शब्दों और तानों से बदन में जलन की भावना होती है, जब कि मधुर शब्द सुनकर ठंडक पहुँचती है, और ऐसा लगता है कि जैसे अमृत बरस रहा हो।

70) क्या मुख ली बिनती करो, लाज आवत है मोहि |
तुम देखत ओगुन करो, कैसे भावो तोही ||
अर्थ: हे भगवान् ! तुझसे प्रार्थना करते हुए मुझे शर्म आती है। क्या तुम मेरी गलतियों और मेरे पापों के बावजूद मुझे अपना सकते हो?

⇐ पढ़ें कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 41 से 50 तक।

पढ़ें कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिंदी में 71 से 95 तक।





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