Tag: Writer Shweta Jhanwar Bhilwara

जानें ईमानदारी का वास्तविक अर्थ !!

जानें ईमानदारी का वास्तविक अर्थ !!

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ईमानदारी का वास्तविक अर्थ :- " ई+ मान+ दारी "अपने आप के साथ जो वफादार रहे, अपनी आत्मा (I) का मान जो रखता है वह गुण का नाम है ईमानदारी! ईमानदारी को इन्सान का सर्वश्रेष्ठ गुण और गहना कहा जाता है, यह गहना ऐसा है जो आज के समय में हर मनुष्य के अंदर से गायब होता नजर आ रहा है।ईमानदारी को लोग सिर्फ हिसाब, रुपये के लेन-देन में गलत नहीं करने तक ही लेते है, जो हिसाब में एक रुपये को इधर-उधर न करे लोग उसे ईमानदार कहेंगे। पर क्या वास्तव में ईमानदारी का अर्थ इतना ही है? नहीं, ईमानदारी का गुण अपने व्यवहार में हर जगह लागू होता है,जैसे:- १. जब हम विद्यार्थी है तो ईमानदारी से गुरु के बताये हुए ज्ञान को अपनाये। पढ़ते वक़्त दिमाग को खेलने में नहीं लगा के क्लास रूम में ही रखना ईमानदारी है।२. जब हम एम्प्लोयी है तो जिस ऑफिस में बैठे है उस ऑफिस के प्रति अपने कार्य को पूरा करना ईमानदारी है।
आत्मविश्लेषण (Introspection)

आत्मविश्लेषण (Introspection)

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आज के समय हर व्यक्ति में अव्यवस्था, मानसिक तनाव और अंतर्मन की शांति का अभाव देखने को मिलता है। कोई भी व्यक्ति थोड़ी सी ज्यादा बात होने पर जुंझला जाता है, उनकी सहन शक्ति और समझने की शक्ति जैसे खत्म सी लगती है। इसका वास्तविक कारण हम सोचे तो पाएंगे की व्यक्ति अपना आत्मविश्लेषण नहीं करता है।आत्मविश्लेषण का तात्पर्य - स्वयं का मूल्यांकन करना अर्थात अपने स्वयं के कार्यों का मापन।एक व्यक्ति रात को सोने से पहले अपने दिनभर की रूटीन को एक बार रीप्ले (Replay) कर के देखे कि :-१. आज मैंने कौनसे कार्य को कितना वक़्त दिया? २. कौनसा कार्य पूरे मन से किया और कौनसा कार्य टालमटोल किया। ३. मेरे किस काम से किसको फायदा हुआ और किस को क्या नुकसान हुआ। ४. मैंने अपने हर रिश्तें के साथ कितनी ईमानदारी और कर्त्तव्य निष्ठा दिखाई। ५. आज किस किस के चहरे पर मै एक मुस्कान लाया? ६. मैंने अपने कार्य पूर्ति
इतना व्यस्त न रहो की रिश्तों की मस्ती न रहे!!

इतना व्यस्त न रहो की रिश्तों की मस्ती न रहे!!

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आज के समय में एक प्रॉब्लम हर इन्सान के साथ रहती है, जब वह फ्री होते है और उसके साथ वाले व्यस्त होते है, तो पहेली शिकायत सामने वाले से होती है- "तुम्हारे पास मेरे लिए टाइम ही नहीं है" यह शिकायत एक पति-पत्नी में समय के साथ सबसे ज्यादा, पेरेंट्स की बच्चे के साथ जो अब बड़े हो गए है और अपने माता पिता को सिर्फ फ़ोन पर याद करते है या साथ में रहते है तो सिर्फ सुबह-शाम प्रणाम करते वक़्त देखते है, भाई की बहन के साथ जो अब ससुराल में है, दोस्तों में हमेशा रहती है।एक पत्नी की अक्सर अपने पति से प्यार भरी शिकायत होती है की - मेरे लिए आपके पास टाइम ही नहीं है, क्यू की पति दिन भर बाहर नौकरी करता है, घर पर जितना टाइम रहे उतना टाइम अपने बच्चो के साथ, अपनी पत्नी की काम में हेल्प करने में निकल देता है, और और दोनों थक के सो जाते है, जब तक दोनों साथ रहेंगे काम में व्यस्त रहेंगे, एक खाना बनाएगा तो दूसरा बच्चे को
वचन का महत्व !

वचन का महत्व !

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आज के समय में हम देखते है की रिश्तों में पहले जितनी मिठास और भावनाये नहीं रही। आखिर इसकी क्या वजह है... अगर थोड़ा सा सोचे तो पाएंगे की रिश्तों में वचन बध्यता का अभाव हो रहा है। आज की पीढ़ी अपने रिश्तों को नहीं समझती और न ही रिश्तों का महत्व। अगर हम सब अपने रिश्तों के प्रति अपने कर्त्तव्य और वचन बध्यता को पूरा करे तो हमारे अपनों के बीच कितना प्रेम बढ़ेगा...आईये जाने वचन का महत्त्व..१. माता पिता अपने बच्चे के लिए कितने प्यार से हर कर्त्तव्य पूरा करते है, क्यों की वह अपने भगवान को वादा करते है की हमारी झोली भरो आप, हम आने वाले का बहुत ख्याल रखेंगे। अपने बच्चे के लिए माता पिता हर तरह का त्याग करते है.. इस तरह बच्चे का पहला कर्त्तव्य और वादा अपने माता पिता के लिए बनता है.. जब हम बड़े होते है तो जो हमारी जिंदगी में आते जाते है, उनके उस प्यार और देखभाल के लिए हमारी जिमेदारी बनती जाती है।
श्रद्धा, विश्वास और सबूरी!

श्रद्धा, विश्वास और सबूरी!

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श्रद्धा, विश्वासः, सबूरी कितने सुन्दर तीन शब्दः में पूरी जिंदगी का राज बता दिया - साईबाबा ने...कलयुग में यह तीन शब्दः अगर जीवन में उतर ले तो सब कुछ काफी आसान लगने लगेगा। परिवार संगठित और समाज और राष्ट्र संपन्न ...श्रद्धा:- भावार्थ रूप में - हमारी आस्था, आदर, और आंतरिक झुकाव, निस्वार्थ प्रेम। बच्चे अपने पेरेंट्स के प्रति जितनी श्रद्धा बचपन में रखते है अगर उतनी ही बड़े होने तक रखे, शिष्य अपने गुरु के लिए, पत्नी अपने पति के लिए रखे, दोस्त अपने दोस्त के प्रति, छोटे अपने बड़ो के प्रति हमेशा श्रदा रखे... तो रिश्तें बहुत खूबसूरत लगते है!विश्वास:- तसल्ली... फेथ... यह विश्वास श्रद्धा के उपरांत ही आता है... जिसमे हमारी श्रद्धा होती है उस पर हम स्वतः ही विश्वासः करने लगते है, सच्ची श्रद्धा के साथ जो विश्वास पनपता है.. वह अत्तुल्य होते है। श्रद्धा अटल है तो विश्वास भी अटल ही होगा।सबूरी:-
वक्त के साथ रिश्ते कैसे बदल रहे हैं! आइए एक नजर डालें!

वक्त के साथ रिश्ते कैसे बदल रहे हैं! आइए एक नजर डालें!

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1. जहां पहले माँ पिता के चरणों में स्वर्ग होता था। आज वहां माता पिता घर में बोझ लगते है। बच्चों को उनका होना उनकी आजादी में रुकावट लगती है।२. जहां पहले बेटियां पिता के सामने नजरे झुका के बात करती थी। आज नजर उठा के जवाब देना अपनी मोर्डेन सोच बोलती है!३. जहां पहले बेटा हर जरुरी फैसला पिता के तजुर्बे से लेता था। आज वही बिना घर में बताये अकेले निर्णय लेना अपना आत्मविशवास बोलता है!४. जहां पहले बहुएें घुंघट निकाल कर अपनों को सामान देती थी। आज उसे रूढ़िवादी बोलते है! और पेंट शर्ट पहनना मोर्डेन कल्चर!५. जहां पहले छोटे बच्चे दादा-दादी की कहानियाँ सुनकर सोते थे। आज वीडियो गेम खेल कर सोते है, उनके माता पिता इतने व्यस्त रहते है की नौकरानी उन बच्चों की माँ बन के पालती है!जैसा प्यार आज के माता पिता बच्चों को देते है, वही.. बच्चे उनको वृद्धवस्था में वृद्धा आश्रम छोड़ के आते है! जवान
धैर्य… धैर्य… धैर्य… (जीवन मंत्र)

धैर्य… धैर्य… धैर्य… (जीवन मंत्र)

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आज की भागती दौड़ती जिंदगी में अगर किसी से कहे की धैर्य रखना सीखो, लोग इसे बड़े हल्के ले लेते है, उन्हें लगता है जैसे दुनिया इतनी तेज और धीरज रखने की बात करते है। पर यह वाकई अद्भुत सत्य है हम थोड़ा सा धैर्य रख के बड़ी से बड़ी समस्या सुलझा सकते है! जैसे :-1:- आज की दैनिक जिंदगी में माता-पिता बच्चों को उनकी किसी गलती पर या उसके किसी कार्य पर डाँट देते है, और बच्चा भी उसकी डाँट पे जल्दी से प्रतिकिर्या कर देता है, "गुस्से से" ऐसे में बहस बढ़ जाती है, और लड़ाई भी अगर बच्चा थोड़ा सा धैर्य रख कर एक पल सोचे की आखिर उसे डांटा क्यूं गया है। थोड़ा रूक कर अपने पेरेंट्स से बात करके अपनी सफाई दे सकता है। तो ऐसे में बच्चे का पेरेंट्स के प्रति और पेरेंट्स का बच्चे के प्रति समझ और प्यार बढ़ता ही है।2:= काम से देरी से लौटने पे पत्नी अपने पति पर आते ही अगर तेजी से बोलना शुरू हो जाये और पति भी वैसे ही गुस्से
दोस्ती कहने में एक शब्दः है! (कविता)

दोस्ती कहने में एक शब्दः है! (कविता)

Kavitayen
दोस्ती कहने में एक शब्दः है.. पर हर इंसान का सबसे करीबी रिश्ता है...दोस्ती सिर्फ शब्दः नहीं जिसका मै अर्थ बता सकू... दोस्ती कोई चीज़ नहीं जिसे मै दिखा सकू...दोस्ती है दिल का रिश्ता, जो हर रिश्ते से ऊपर है... दोस्ती है वफ़ा की परिभाषा जो हर शब्दः से परे है....दोस्ती मेरी भावनाओ का रूप, दोस्त मेरा आयना है... दोस्ती मेरी दुआ रब से... दोस्त खुदा का नजराना है...दोस्ती मेरी भक्ति है वफ़ा की... दोस्त मेरा वो खुदा है... बुरे वक़्त मै जो बिन बोले हाथ थाम ले वो दोस्त मेरा है...नोख जोकः रूठना मुस्कराना हर पल जिसके साथ... दो पल भी लड़ के दूर रहना हो जैसे सजा ए मौत...दोस्ती मेरी कहानी जीवन की, दोस्त कहानी का राजा है... हर सुख दुःख का साथी वो मेरा... वो वफ़ा का सच्चा है...हर शख्श चाहता है अच्छा दोस्त रहे जिंदगी मै... हर पलके चाहती है... दोस्त का चेहरा रहे आँखों मै...सी
प्रकृति हमें देती है सब कुछ… (कविता)

प्रकृति हमें देती है सब कुछ… (कविता)

Kavitayen
प्रकृति हमे देती है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे...सूरज हमे रौशनी देता, हवा नया जीवन देती है... भूख मिटने को हम सबकी, धरती माँ अन्न देती है...पथिको को ताप्ती धुप में, पेड़ सदा देते ह छाया फूल सुगंध देते है, हम सबको फूलों की माला...पहाड़ गिरी ऊँचे ऊँचे, देते है औषधियों का भंडार कल कल बहती नदिया झरने, मिटाते हमारी प्यास...प्रकृति देती इतना कुछ बदले में हम क्या देते है? सोच के देख मनुज तेरी इंसानियत कहाँ है???जो पेड़ छाया फल देते, उनको तू काट रहा है... जिन फूलों की माला तू पहने उन बगिया को मिटा रहा है...जो धरती देती खाने को दाना, उसको बंजर बन रहा है... ऊँचे ऊँचे आशियाने के लिए, धरती का सीना फाड़ रहा है...जो पहाड़ रक्षा तेरी करते, उन औषधियों को हटा रहा है... जो नदिया तेरी प्यास बुझाती, उनके रास्ते बदल रहा है...जो प्रकृति तुझे इतना देती है, तू उसका सब कुछ चीन
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