Tag: Motivational Stories in Hindi

तीन लघु कथाएं Short Story in Hindi

तीन लघु कथाएं Short Story in Hindi

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तीन लघु कथाएं 1- ईमानदारी - महेश राजा2- प्रवचन - शुभम बैश्‍णव3- पश्‍चाताप की अग्नि - शांतिलाल सोनी  ईमानदारी - महेश राजा थ्री टीयर, स्‍लीपर कोच के पास बड़ी भीड़ थी। जैसे ही टीसी बोगी से बाहर निकला तो लोगों के हजूम ने उसे घेर लिया। लोग 200-500 के नोट लेकर टीसी की तरफ  बढ़े। टीसी ने कहा, 'नही-नही! रहने दीजिए। अंदर जाकर बैठिए। बर्थ होगी तो मैं जरूर आवंटित करूंगा।' उन्‍होंने किसी से भी पैसे नहीं लिए और कुछ लोगों को ईमानदारी से रसीद काट कर सीट आवंटित कर दी।मै रोजाना अप-डाउन करता था। मुझसे रहा नहीं गया तो पूछ लिया, 'क्‍यों साहब, आज ईमानदारी से? क्‍या बात है? मैंने राज जानना चाहा।वे सपाट स्‍वर में बोले, 'आगे विजिलेंस की चेकिंग है'   प्रवचन - शुभम बैश्‍णव गांव के मंदिर में पंडित जी प्रवचन सुना रहे थे। बीच-बीच में वे कहते, 'यह जो सोच है, वही मानव कल्‍
बाड़े की उस कील ने बताया गुस्‍से का प्रभाव!!

बाड़े की उस कील ने बताया गुस्‍से का प्रभाव!!

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बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था। वह बहुत गुस्‍सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आपा खो बैठता और लोगों को भला-बुरा कह देता। उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि अब जब भी तुम्‍हें गुस्‍सा आए तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना। लड़के ने इस बात के लिए हामी भर दी।पहले दिन उस लड़के को 40 बार गुस्‍सा आया और उसने इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी। धीरे-धीरे कीलों की संख्‍या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्‍छा है कि क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी आपा नहीं खोया। उस दिन उसे एक भी कील नहीं गाढ़नी पड़ी।जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्‍होंने उसे एक काम दे दिया। उन्‍होंने कहा कि अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गु
एक छोटा बच्चा लोगों से भीख मांग रहा था!!

एक छोटा बच्चा लोगों से भीख मांग रहा था!!

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सड़क किनारे एक छोटा बच्चा बहुत गंदे और फटे हुए कपड़े पहने आते जाते लोगों से भीख मांग रहा था। ठंड से बचने के लिए उसके पास एक पुराना फटा हुआ जूट का वोरा था, जो लोगों को पास आता देख वह अपने ऊपर से हटा देता था, शायद इसीलिए कि उसका सूजा हुआ अजीब सा दयनीय चेहरा लोग देखकर उसे भीख दें।मैं भी उससे कुछ दूर खड़ा धूप सेक रहा था। और मन में एक ही ख्याल चल रहा था कि भिखारी स्वयं भीख मांगते हैं, यहां तक ठीक है परन्तु अपने बच्चों से भीख मंगवाना अपराध है और मैं इससे नफरत करता हूं ।बहुत देर से मैं उस बच्चे की हरकत देख रहा था । और उसके माता पिता को भरपूर कोस रहा था। करीब बीस मिनट हो गये थे, अभी तक किसी ने भी उसको भीख नहीं दी थी और यह देख कर मैं बहुत प्रसन्न था, शायद उस बच्चे को समझ आये कि भीख मांगने से नहीं मिलता, मेहनत कर कमाना पड़ता है ।मैं भी वहां से अब निकलने की तैयारी में था, और उस भिखारी बच्चे न
घर मे कोई नही है! प्रेरणादायक कहानी

घर मे कोई नही है! प्रेरणादायक कहानी

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शाम को दफ़्तर से घर आते समय देखा कि एक छोटा-सा बोर्ड रेहड़ी की छत से लटक रहा था जिस पर मार्कर से लिखा हुआ था:घर मे कोई नही है, मेरी बूढ़ी माँ बीमार है, मुझे थोड़ी-थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा और हाजत कराने के लिए घर जाना पड़ता है, अगर आपको जल्दी है तो अपनी इच्छा से फल तौल लें और पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें।साथ ही मूल्य भी लिखे हुये हैं...और यदि आपके पास पैसे न हों तो मेरी ओर से ले लेना...अनुमति है।मैंने इधर-उधर देखा। पास पड़े तराज़ू में दो किलो सेब तौले, एक दर्जन केले लिए...बैग में डाले...प्राइस लिस्ट से कीमत देखी...पैसे निकालकर गत्ते को उठाया... वहाँ सौ, पचास और दस-दस के नोट पड़े थे। मैंने भी पैसे उसमें रख कर उसे ढक दिया। बैग उठाया और घर आ गया। खाना खाकर श्रीमती और मैं घूमते-घूमते उधर से निकले तो देखा एक कृशकाय अधेड़ आयु का व्यक्ति मैले से कुर्ते-पाज़ामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर
सूर्य पर ध्‍यान दो! ~ लघुकथा

सूर्य पर ध्‍यान दो! ~ लघुकथा

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यह एक राजा की कहानी है, जिसने अपने ही 3 दरबारियों को एक ही अपराध की तीन अलग-अलग प्रकार की सजा दी। पहले को राजा ने कुछ बर्षो का कारावास दिया, दूसरे को देश निकाला तथा तीसरे से मात्र इतना कहा कि मुझे आश्चर्य है, ऐसे कार्य की तुमसे मैंने कभी आपेक्षा नहीं की थी।और जानते हैं कि इन भिन्‍न सजाओं का परिणाम क्‍या हुआ?पहला व्‍यक्ति दुखी हुआ और दूसरा व्‍यक्ति भी, तीसरा व्‍यक्ति भी लेकिन उनके दुख के कारण भिन्‍न थे। तीनों ही व्‍यक्ति अपमान और असम्‍मान के कारण दुखी थे लेकिन पहले और दूसरे व्‍यक्ति का अपमान दूसरों के समक्ष था। तीसरे का अपमान स्‍वयं के समक्ष।यह भेद बहुत बड़ा है।पहले व्‍यक्ति ने थोड़े ही दिनों में कारागृह के लोगों से मैत्री कर ली और वहीं आनंद से रहने लगा। दूसरे व्‍यक्ति ने भी देश से बाहर जाकर बहुत बड़ा व्‍यापार कर लिया और धन कमाने लगा लेकिन तीसरा व्‍यक्ति क
दही का इंतजाम ~ Hindi Moral Story

दही का इंतजाम ~ Hindi Moral Story

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शर्माजी जब लगभग 45 वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। बहुत से लोगों ने शर्माजी से दूसरी शादी की सलाह दी परंतु शर्माजी ने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी।पुत्र जब वयस्क हुआ तो शर्माजी ने पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। और स्वयं कभी मंदिर और आॅफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे।पुत्र की शादी के बाद शर्मा जी और अधिक निश्चित हो गये। अपना पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया।पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दोपहरी में शर्माजी खाना खा रहे थे, पुत्र भी ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था।उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही उपलब्ध नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये।पुत्र अपनी पत्नी क
एक अत्यंत प्रेरक पत्र जो हर एक को जरूर पढ़ना चाहिए!!

एक अत्यंत प्रेरक पत्र जो हर एक को जरूर पढ़ना चाहिए!!

Miscellaneous
घनश्याम दास जी बिड़ला (G.D. Birla) द्वारा अपने पुत्र बसंत कुमार जी बिड़ला (B.K. Birla) के नाम 1934 में लिखा गया एक अत्यंत प्रेरक पत्र जो हर एक को जरूर पढ़ना चाहिए।चि. बसंत... यह जो लिखता हूँ उसे बड़े होकर और बूढ़े होकर भी पढ़ना, अपने अनुभव की बात कहता हूँ। संसार में मनुष्य जन्म दुर्लभ है और मनुष्य जन्म पाकर जिसने शरीर का दुरुपयोग किया, वह पशु है। तुम्हारे पास धन है, तन्दुरुस्ती है, अच्छे साधन हैं, उनको सेवा के लिए उपयोग किया, तब तो साधन सफल है अन्यथा वे शैतान के औजार हैं। तुम इन बातों को ध्यान में रखना।धन का मौज-शौक में कभी उपयोग न करना, ऐसा नहीं की धन सदा रहेगा ही, इसलिए जितने दिन पास में है उसका उपयोग सेवा के लिए करो, अपने ऊपर कम से कम खर्च करो, बाकी जनकल्याण और दुखियों का दुख दूर करने में व्यय करो। धन शक्ति है, इस शक्ति के नशे में किसी के साथ अन्याय हो जाना संभव है, इसका ध्यान रखो क
कर्म की ताकत (Motivational Story)

कर्म की ताकत (Motivational Story)

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उस समय फ्रांस के महान विजेता नेपोलियन एक साधारण सैनिक थे। वह बेहद मेहनती और अपने काम के प्रति समर्पित थे। एक दिन राह में एक ज्‍योतिषी कुछ लोगों का हाथ देख रहे थे। नेपोलियन भी वहां रूक गए और अपना हाथ ज्‍योतिषी के आगे कर दिया। ज्‍योतिषी काफी देर तक हाथ पढ़ता रहा और अचानक उनका चेहरा उदास हो गया। उसके मनोभावों को नेपोलियन समझ गए और बोले 'क्‍या हुआ महाराज? क्‍या मेरे हाथ में कोई अनहोनी बात लिखी है! जिससे आप चिन्तित हो गऐ है।' ज्‍योतिषी ने अपनी गर्दन मोड़ी और बोला 'तुम्‍हारे हाथ में आयु रेखा ही नहीं है 'में यही देखकर चिन्तित था। जिसके हाथ में भाग्‍य रेखा ही न हो उसका भाग्‍य प्रबल कैसे हो सकता है? ज्‍योतिषी की बात सुनकर नेपोलियन दंग रह गए। वह बहुत ही महत्‍वाकांक्षी थे उन्‍होंने ज्‍योतिषी की बात से बहुत आघात पहुंचा। वह ज्‍योतिषी से बोले 'महाराज, मैं अपने कर्म से अपना भाग्‍य ही बदल दूंगा। जीवन हाथ
अमरूद वाली बुढि़या और शर्मा जी ~ Inspirational Story!

अमरूद वाली बुढि़या और शर्मा जी ~ Inspirational Story!

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ऑफिस से निकल कर शर्माजी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया, पत्नी ने कहा था, 1 Kg अमरूद लेते आना। तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा अमरूद बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी।वैसे तो वह फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे, पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ?उन्होंने बुढ़िया से पूछा, "माई, अमरूद कैसे दिए" बुढ़िया बोली, बाबूजी बीस रूपये किलो, शर्माजी बोले, माई 15 रूपये दूंगा। बुढ़िया ने कहा, अट्ठारह रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी। शर्मा जी बोले, 15 रूपये लेने हैं तो बोल, बुझे चेहरे से बुढ़िया ने, "न" मे गर्दन हिला दी।शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर अमरूद का भाव पूछा तो वह बोला 24 रूपये किलो हैं बाबूजी, कितने किलो दे दूँ? शर्माजी बोले, 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, ठीक भाव लगाओ। तो उसने
अच्छाई और बुराई…

अच्छाई और बुराई…

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उभरती बुराई ने दबती सी अच्छाई से कहा, कुछ भी हो, लाख मतभेद हो पर है तू मेरी सहेली। मुझे अपने सामने तेरा दबना अच्छा नही लगता। अलग खड़ी न हो मुझमें मिल जा। मै तुझे भी अपने साथ बढ़ा लूंगी, समाज में फैला लूंगी। भलाई ने शांति से उत्तर दिया, तुम्हारी हमदर्दी के लिए धन्यवाद, पर रहना मुझे तुमसे अलग ही है। क्यो? आश्चर्य भरी अप्रसन्नता से बुराई ने पूछा।अच्छाई ने और भी शांत होकर जवाब दिया। बात यह है कि मैं तुमसे मिल जांऊ तो फिर मैं कहां रहूंगी? तब तो तुम ही तुम होगी सब जगह।गुस्से से उफनकर बुराई ने अपनी झाड़ी अच्छाई के चारों ओर फैलाकर जकड़ लिया और फुंफकारकर कहा ले भोग मेरे निमंत्रण को ठुकराने का नतीजा! अब पड़ी रह मिट्टी में मुंह दुबकाए, दुनिया में तेरे फैलने का अब कोई मार्ग नही।अच्छाई ने अपने नन्हे अंकुर की आंख से जहां भी झांका उसे बुराई की जकड़ बंध, झाड़ी के तेज कांटे, भाले के समान तने हुए दिखाई
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