गूंज – लधु कथा!

बीती रात तनाव भरी गुजरने की वजह से सुबह आंख करीब दस बजे खुली। बच्‍चे कॉलेज जा चुके थे। बॉस के शब्‍द अभी भी उसके कानों में गूंज रहे थे ” प्रकाश जी आप आदमी हैं या गधे, एक काम आपसे ढंग से नही होता!”

उसने शीशे में खुद को गौर से देखा फिर गहरी सांस छोड़ते हुए हाथ-मुंह धोकर अखबार उठाया। मुख्‍य पृष्‍ठ पर छपी एक छात्र की आत्‍महत्‍या की खबर को पढ़कर मन विरक्ति से भर गया।



उसने अखबार को समेटकर वापस रखा। पत्‍नी को चाय की कहकर टीवी ऑन किया। यहां भी किसानों की आत्‍महत्‍या की खबर को महिमा मंडित किया जा रहा था। उसने गर्दन को सोफे पर टिका कर आंखे मूंद लीं।

पत्‍नी द्वारा चाय का कप लेकर अपने पर उसने उसे पास बैठने को कहा। अपनी व्‍यस्‍तताओं के चलते पत्‍नी के मना करने पर वह मेज पर रखी फिल्‍मी पत्रिका लेकर अपने कमरे में आ गया। दो तीन पेज पलटे ही थे कि एक सिनेमा तारिका की तस्‍वीर दिखी जिसने हाल ही में आत्‍महत्‍या की थी। वही सब खबरें पढ़कर बॉस के शब्‍द फिर से कानों में उतर आए। मन के किसी कोने में ढेंचू-ढेंचू की आवाज गूंजने लगी। उसने सिरहाने रखी नींद की गोलियों की तरफ देखा। निमंत्रण देती हुए शीशी से वापस नजर हटाकर वह बिस्‍तर पर सीधा लेट गया। ऊपर चलते पंखे में उसे फिर से न्‍यौता दिखा। मनोबल टूटते ही उसने पंखे पर रस्‍सी डाली।

जेब में रखे फोन को बाहर निकालकर रखना चाहा तो देखा उसकी बेटी का एक संदेश था।

” पापा आपने जो मेरा स्‍कूल प्रोजेक्‍ट तैयार करवाया था, उसे प्रथम पुरस्‍कार मिला है!…
सचमुच आप दुनिया के बेस्‍ट पापा हो, मेरे सुपर हीरो… लव यू पापा!”

दिमाग से नकारात्‍मकता की धुंध छंटते ही उसके होंठो पर मुस्‍कान आ गई। रस्‍सी वापस उतारकर उसने फोन की स्‍क्रीन से अपनी कंपनी का लोगों हटाया और अपने बच्‍चों की तस्‍वीर लगा ली। मन की सूखी घास धीरे-धीरे वापस हरी हो रही थी…

-सुनील वर्मा


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