दो लघुकथाएँ “मालिक” और “प्रेम के मायने”

लघुकथा – मालिक

किसान ‘ज़मीदार’ होता है, ज़मीन का मालिक। लेकिन इसका अहसास कितने लोगों को होता है ?

नत्‍थूराम के दोनों बेटे क़ाबिल थे। बड़ा बेटा रोहित एम.ए. करने के पश्‍चात प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था। छोटे बेटे पंकज की इसी वर्ष बी.एस.सी. पूर्ण हो गई थी। नत्‍थूराम एक मेहनती किसान है। अच्‍छी-खासी कृषि योग्‍य भूमि, अपना मकान, पशु सब कुछ था। दोनों पुत्र बाहरी मन से खेती में उसका सहयोग करते। काफी कह-सुन कर नत्‍थूराम दोनों लड़को को अपने साथ खेतों में काम करवाता।



‘पिताजी, मैं कल सुबह शहर जा रहा हूं। मेरे दोस्‍त के पिता ने फैक्‍ट्री में बात करली है। मल्‍टीनेशनल कंपनी है। दवाइयां बनाजी है। अभी तनख्‍़वाह कम है, पर बता रहे हैं कि फैक्‍ट्री में तनख्‍़वाह बड़ी तेजी से बढ़ती है’ पंकज अत्‍यंत उत्‍साहित था।

रात्रि को नत्‍थूराम के पूरे परिवार ने भोजन किया। भोजन करने के उपरान्‍त नत्‍थूराम ने दोनों बेटों को समझाया ‘तुम आजकल की पीढ़ी हो। जैसी तुम्‍हारी मर्जी, वैसा करो। पर एक बात हमेशा याद रखना कि इसी खेती से ही मैंने तुम दोनों को उच्‍च शिक्षा दिलवाई। गांव से स्‍कूली शिक्षा पूरी होने के बाद शहर में कॉलेज में भेजा। बेटा, नौकरी तो गुलामी है। तुम कुर्सी पर बैठने वाली नौकरी चाहते हो तो मैं रोकूंगा नहीं, पर याद रखना नौकरी में तुम हमेशा नौकर ही रहोगे, मालिक नहीं। सारी जिंदगी शहर में ही धक्‍के खाते रहोगे। न साफ हवा, न साफ पानी, न शुद्ध खाना-पीना, न शुद्ध अनाज, बिना सप्रे की सब्जियां। मेरी बात मानो, बुजुर्गो की अच्‍छी ज़मीन है। तुम्‍हारी शिक्षा व्‍यर्थ नहीं जाएगी। दोनों भाई मिलकर वैज्ञानिक ढंग से आधुनिक खेती करो। मेरे पिता ने मुझे नौकर नहीं मालिक बनाया। मैं चाहता हूं तुम भी ताउम्र मालिक रहो। फिर बेटा किसान तो देश की रीढ की हड्डी है। अन्नदाता है। अपना पेट भरने के अलावा देशवासियों का पेट भरता है। मैंने सुना है कि शहर में नौकरी करने वाले तो अपने परिवार का पेट ढंग से नहीं भर पाते’

दोनों बेटे सोने चले गए। अगले दिन प्रात: नत्‍थूराम खेत को जाने लगा, तो दोनों बेटे बोले, ‘मां हमारा खाना भी बांध दे। हम भी पिताजी के साथ खेत में चलेंगे।

नत्‍थूराम के चेहरे पर चमक थी। तीनों खिलखिलाते हुए खेत की ओर चल पड़े। मुस्‍कुराता हुआ सूरज उनका स्‍वागत कर रहा था।

लेखक – अदिल कंसल


लघुकथा – प्रेम के मायने

प्रेम परवाह के रूप में रह चुका है। अब समझौते के रूप में भी रह रहा है। कही ऊपर के माले पर तो कहीं घर से बाहर भी।

मधुमक्खियों के झुंड की भांति अमलतास की पत्तियां तेज़ हवा के चक्रव्‍यूह में घूमते हुए शर्मा जी के चारों ओर गिर रही थीं परंतु उनका कहीं और ही ध्‍यान था।

‘दादू अंदर चलो, बारिश होने वाली है!’ जब शर्मा जी की पोती अनु ने यह कहकर उनकी उंगली थाम कर उन्‍हें खींचने की कोशिश की तो शर्मा जी का ध्‍यान टूटा। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और मौसम देखकर लग रहा था कि बारिश जरूर होगी। शर्मा जी के अंतर्मन में भी कुछ इसी तरह का मौसम था। वे सोच रहे थे, आजकल प्रेम के मायने बदल गए हैं। जब उनकी मां थीं तब उन्‍हें कभी भी अपने पिताजी में प्रेम नहीं दिखा, लेकिन जिस दिन उनकी मां संसार से चली गई थीं उस दिन उन्‍हें पता चला था कि मां हो या पिता, प्रेम दोनों एक समान करते हैं। शर्मा जी के जवानी के दिनों में वे अपने पिजाजी की तरह ही थे। एक दम कंजूस और कितने दु:खी रहते थे। आज उनके बेटों ने क्‍या कुछ नहीं कमाया। ईश्‍वर की कृपा से सब कुछ है। प्रेम तो आज भी उतना ही है। पिता-पुत्र या पिता-पुत्री के बीच। प्रेम कभी कम हो ही नहीं सकता। हां, प्रेम के मायने बदल गए हैं। मंजि़ल तक जाने के नए रास्‍ते मिल गए हैं। आज आमदानी बढ़ी है। जीवन स्‍तर सुधरा है। विचारों में खुलापन आया है। और प्रेम समझौत के रूप में भी दिखने लगा है। शर्मा जी कुछ औश्र देर अपने ख्‍यालों में गोते लगाते, उससे पहले अनु दे दोबारा उनका हाथ खींचा और बोली – ‘दादू, मम्‍मी बुला रही हैं! जाना पड़ेगा मुझे अब।’

शर्माजी ने उसे गोद में उठा लिया। उसने तपाक से उनका गाल चूम लिया। शर्मा जी एक मंद मुस्‍कान में मुस्‍करा दिए। अनु गोद से उतर कर दौड़ लगाते हुए कार में जाकर बैठ गई। शर्मा जी भी जल्‍दी से वृद्धाश्रम के अंदर जाने को तत्‍पर हए डर था कहीं बारिश न होने लगे।

लेखक- गोविन्‍द सिंह वर्मा


लघुकथा – सिरफि़री

बदलाव की रफ़्तार धीमी ही होती है। इसे समझकर अमल करने वाले को काई सिरफ़रा कहे, तो कहे।

‘सुनिए! कल दोपहर हमारी महिला मंडली का दीपावली स्‍नेह मिलन कार्यक्रम है, आप ये कुछ मिठाई-नमकीन मंगवाने की व्‍यवस्‍था करवा दीजिए’ रमा ने पति विनय को लिस्‍ट थमाते हुए कहा। ‘तुम लोग भी किस ज़माने में जी रही हो। अरे भई ऑनलाइन ऑडर्र करने वाले जरिए किस लिए हैं। बस! एक फोन घुमाओ और मनचाहा खाना घर मंगवाओ’ विनय ने माखौल वाले अंदाज में कहा।

‘नहीं! हम सबने तय किया है कि लोग अपनी पार्टी में प्‍लास्टिक का उपयोग नहीं करेंगे। देखते नहीं! इनका खाने-पीने का सारा सामान सस्‍ते प्‍लास्टिक के डिब्‍बों या थैलियों में पैक होकर आता है’ रमा ने कहा।

‘तुम भी ना, कमाल करती हो। अरे! सब लोग यदि तुम जैसे सिरफिरे हो जाएं तो इनका बिजनेस तो ठप्‍प हुआ ही समझो। बेचारे कितनी मेहनत कर रहे हैं दूर-दूर तक खाना पहुंचाने में। वैसे भी तुम एक-दो महिलाओं के बहिष्‍कार करने से ये दुनिया नहीं बदलने वाली। इसलिए जमाने के साथ चलो। चिंता छोड़ो, सुख से जीओ,’ विनय ने पत्‍नी को समझाना चाहा।

‘हमें दुनिया को बदलने में कोई दिलचस्‍पी नहीं है। बस, हम खुद दुनिया को बेहतरी की उम्‍मीद में बदल जाएं, हमारे लिए यही संतोषजनक होगा। और सुनो! ध्‍यान रखना कि मिठाई गत्‍ते के डिब्‍बे में और नमकीन कागज के लिफाफे में ही होनी चाहिए’ रमा ने कहा। ‘सिरफिरी कहीं की! विनय गर्व से मुस्‍कराया और पर्ची जेब में ठूंस ली!

लेखिका :- आशा शर्मा





Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!